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किसान कल्याण

IYoM: मिलेट्स (MILLETS) यानी बाजरा को अब गरीब का भोजन नहीं, सुपर फूड कहिये

IYoM: मिलेट्स (MILLETS) यानी बाजरा को अब गरीब का भोजन नहीं, सुपर फूड कहिये

दुनिया को समझ आया बाजरा की वज्र शक्ति का माजरा, 2023 क्यों है IYoM

पोषक अनाज को भोजन में फिर सम्मान मिले - तोमर भारत की अगुवाई में मनेगा IYoM-2023 पाक महोत्सव में मध्य प्रदेश ने मारी बाजी वो कहते हैं न कि, जब तक योग विदेश जाकर योगा की पहचान न हासिल कर ले, भारत इंडिया के तौर पर न पुकारा जाने लगे, तब तक देश में बेशकीमती चीजों की कद्र नहीं होती। कमोबेश कुछ ऐसी ही कहानी है देसी अनाज बाजरा की।

IYoM 2023

गरीब का भोजन बताकर भारतीयों द्वारा लगभग त्याज्य दिये गए इस पोषक अनाज की महत्ता विश्व स्तर पर साबित होने के बाद अब इस अनाज
बाजरा (Pearl Millet) के सम्मान में वर्ष 2023 को इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स (आईवायओएम/IYoM) के रूप में राष्ट्रों ने समर्पित किया है।
इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स (IYoM) 2023 योजना का सरकारी दस्तावेज पढ़ने या पीडीऍफ़ डाउनलोड के लिए, यहां क्लिक करें
मिलेट्स (MILLETS) मतलब बाजरा के मामले में भारत की स्थिति, लौट के बुद्धू घर को आए वाली कही जा सकती है। संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2023 को अंतरराष्ट्रीय पोषक-अनाज वर्ष घोषित किया है। पीआईबी (PIB) की जानकारी के अनुसार केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा जुलाई मासांत में आयोजित किया गया पाक महोत्सव भारत की अगुवाई में अंतरराष्ट्रीय पोषक-अनाज वर्ष (IYoM)- 2023 लक्ष्य की दिशा में सकारात्मक कदम है। पोषक-अनाज पाक महोत्सव में कुकरी शो के जरिए मिलेट्स (MILLETS) यानी बाजरा, अथवा मोटे अनाज पर आधारित एवं मिश्रित व्यंजनों की विविधता एवं उनकी खासियत से लोग परिचित हुए। आपको बता दें, मिलेट (MILLET) शब्द का ज्वार, बाजरा आदि मोटे अनाज संबंधी कुछ संदर्भों में भी उपयोग किया जाता है। ऐसे में मिलेट के तहत बाजरा, जुवार, कोदू, कुटकी जैसी फसलें भी शामिल हो जाती हैं। पीआईबी द्वारा जारी की गई सूचना के अनुसार महोत्सव में शामिल केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने मिलेट्स (MILLETS) की उपयोगिता पर प्रकाश डाला।

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अपने संबोधन में मंत्री तोमर ने कहा है कि, “पोषक-अनाज को हमारे भोजन की थाली में फिर से सम्मानजनक स्थान मिलना चाहिए।” उन्होंने जानकारी में बताया कि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2023 को अंतरराष्ट्रीय पोषक-अनाज वर्ष घोषित किया है। यह आयोजन भारत की अगु़वाई में होगा। इस गौरवशाली जिम्मेदारी के तहत पोषक अनाज को बढ़ावा देने के लिए पीएम ने मंत्रियों के समूह को जिम्मा सौंपा है। केंद्रीय कृषि मंत्री तोमर ने दिल्ली हाट में पोषक-अनाज पाक महोत्सव में (IYoM)- 2023 की भूमिका एवं उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि, अंतरराष्ट्रीय बाजरा वर्ष (IYoM)- 2023 के तहत केंद्र सरकार द्वारा स्थानीय, राज्य, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक कार्यक्रमों के आयोजन की विस्तृत रूपरेखा तैयार की गई है।

बाजरा (मिलेट्स/MILLETS) की वज्र शक्ति का राज

ऐसा क्या खास है मिलेट्स (MILLETS) यानी बाजरा या मोटे अनाज में कि, इसके सम्मान में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूरा एक साल समर्पित कर दिया गया। तो इसका जवाब है मिलेट्स की वज्र शक्ति। यह वह शक्ति है जो इस अनाज के जमीन पर फलने फूलने से लेकर मानव एवं प्राकृतिक स्वास्थ्य की रक्षा शक्ति तक में निहित है। जी हां, कम से कम पानी की खपत, कम कार्बन फुटप्रिंट वाली बाजरा (मिलेट्स/MILLETS) की उपज सूखे की स्थिति में भी संभव है। मूल तौर पर यह जलवायु अनुकूल फसलें हैं।

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शाकाहार की ओर उन्मुख पीढ़ी के बीच शाकाहारी खाद्य पदार्थों की मांग में उल्लेखनीय रूप से वृद्धि हो रही है। ऐसे में मिलेट पॉवरफुल सुपर फूड की हैसियत अख्तियार करता जा रहा है। खास बात यह है कि, मिलेट्स (MILLETS) संतुलित आहार के साथ-साथ पर्यावरण की सुरक्षा में भी असीम योगदान देता है। मिलेट (MILLET) या फिर बाजरा या मोटा अनाज बी-कॉम्प्लेक्स विटामिन और खनिजों जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों का भंडार है।

त्याज्य नहीं महत्वपूर्ण हैं मिलेट्स - तोमर

आईसीएआर-आईआईएमआर, आईएचएम (पूसा) और आईएफसीए के सहयोग से आयोजित मिलेट पाक महोत्सव के मुख्य अतिथि केंद्रीय कृषि मंत्री तोमर थे। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि, “मिलेट गरीबों का भोजन है, यह कहकर इसे त्याज्य नहीं करना चाहिए, बल्कि इसे भारत द्वारा पूरे विश्व में विस्तृत किए गए योग और आयुर्वेद के महत्व की तरह प्रचारित एवं प्रसारित किया जाना चाहिए।” “भारत मिलेट की फसलों और उनके उत्पादों का अग्रणी उत्पादक और उपभोक्ता राष्ट्र है। मिलेट के सेवन और इससे होने वाले स्वास्थ्य लाभों के बारे में जागरूकता प्रसार के लिए मैं इस प्रकार के अन्य अनेक आयोजनों की अपेक्षा करता हूं।”

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मिलेट और खाद्य सुरक्षा जागरूकता

मिलेट और खाद्य सुरक्षा संबंधी जागरूकता के लिए होटल प्रबंधन केटरिंग तथा पोषाहार संस्थान, पूसा के विद्यार्थियों ने नुक्कड़ नाटक प्रस्तुत किया। मुख्य अतिथि तोमर ने मिलेट्स आधारित विभिन्न व्यंजनों का स्टालों पर निरीक्षण कर टीम से चर्चा की। महोत्सव में बतौर प्रतिभागी शामिल टीमों को कार्यक्रम में पुरस्कार प्रदान कर प्रोत्साहित किया गया।

मध्य प्रदेश ने मारी बाजी

मिलेट से बने सर्वश्रेष्ठ पाक व्यंजन की प्रतियोगिता में 26 टीमों में से पांच टीमों को श्रेष्ठ प्रदर्शन के आधार पर चुना गया था। इनमें से आईएचएम इंदौर, चितकारा विश्वविद्यालय और आईसीआई नोएडा ने प्रथम तीन क्रम पर स्थान बनाया जबकि आईएचएम भोपाल और आईएचएम मुंबई की टीम ने भी अंतिम दौर में सहभागिता की।

इनकी रही उपस्थिति

कार्यक्रम में केंद्रीय राज्यमंत्री कैलाश चौधरी, कृषि सचिव मनोज आहूजा, अतिरिक्त सचिव लिखी, ICAR के महानिदेशक डॉ. त्रिलोचन महापात्र और IIMR, हैदराबाद की निदेशक रत्नावती सहित अन्य अधिकारी एवं सदस्य उपस्थित रहे। इस दौरान उपस्थित गणमान्य नागरिकों की सुपर फूड से जुड़ी जिज्ञासाओं का भी समाधान किया गया। महोत्सव के माध्यम से मिलेट से बनने वाले भोजन के स्वास्थ्य एवं औषधीय महत्व संबंधी गुणों के बारे में लोगों को जागरूक कर इनके उपयोग के लिए प्रेरित किया गया। दिल्ली हाट में इस महोत्सव के दौरान पोषण के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां प्रदान की गईं। इस विशिष्ट कार्यक्रम में अनेक स्टार्टअप ने भी अपनी प्रस्तुतियां दीं। 'छोटे पैमाने के उद्योगों व उद्यमियों के लिए व्यावसायिक संभावनाएं' विषय पर आधारित चर्चा से भी मिलेट संबंधी जानकारी का प्रसार हुआ। अंतर राष्ट्रीय बाजरा वर्ष (IYoM)- 2023 के तहत नुक्कड़ नाटक तथा प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिताओं जैसे कार्यक्रमों के तहत कृषि मंत्रालय ने मिलेट के गुणों का प्रसार करने की व्यापक रूपरेखा बनाई है। वसुधैव कुटुंबकम जैसे ध्येय वाक्य के धनी भारत में विदेशी अंधानुकरण के कारण शिक्षा, संस्कृति, कृषि कार्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय पोषक-अनाज वर्ष (IYoM)- 2023 जैसी पहल भारत की पारंपरिक किसानी के मूल से जुड़ने की अच्छी कोशिश कही जा सकती है।
विपक्ष ने गेहूं संकट पर पूछा सवाल, तो केंद्रीय मंत्री तोमर ने दिया ये जवाब

विपक्ष ने गेहूं संकट पर पूछा सवाल, तो केंद्रीय मंत्री तोमर ने दिया ये जवाब

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने संसद में गेंहू उत्पादन, खरीद एवं उसकी कीमत की स्थिति के बारे में जानकारी दी। गेहूं के कम उत्पादन और खरीद से संबंधित संसद में केंद्र सरकार से पूछे गए सवाल के जवाब में केंद्रीय कृषि मंत्री ने गेहूं की मौजूदा स्थिति की जानकारी दी। सरकार से सवाल किया गया था कि, क्या देश में गेहूं की कमी है ?

गेहूं की कीमत अभी भी MSP से अधिक, 10.64 करोड़ टन गेहूं उत्पादन का अनुमान

केंद्रीय कृषि मंत्री का जवाब

संसद में इस सवाल के जवाब में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने देश में गेहूं का किसी तरह का कोई संकट न होने की बात कही। उन्होंने सदन को बताया कि, गेहूं निर्यात पर रोक लगाए जाने के बावजूद गेहूं की कीमत, न्यूनतम समर्थन मूल्य से अधिक बनी हुई है। सदन में प्रस्तुत गेहूं की स्थिति से संबंधित विस्तृत जवाब में केंद्रीय मंत्री तोमर ने कहा कि, देश में गेहूं का कोई संकट नहीं है। उन्होंने बताया कि, देश के कृषक घरेलू जरूरत से अधिक मात्रा में गेहूं की पैदावार कर रहे हैं।



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गर्मी से पड़ा प्रभाव

तोमर ने मार्च के महीने में पड़ी तेज गर्मी के कारण गेहूं के उत्पादन में कमी आने की सदन को जानकारी प्रदान की। उन्होंने बताया कि, खुले बाजार में ऊंचे दाम मिलने के कारण किसानों ने वहां गेहूं बेचा। इस कारण सरकारी खरीद लक्ष्य के अनुसार पूरी नहीं हो पाई।

गेहूं निर्यात प्रतिबंध

व्यापारियों द्वारा निर्यात के मकसद से किसानों से भारी मात्रा में गेहूं खरीदा जा रहा था। इससे भी सरकारी खरीद प्रक्रिया लक्ष्य प्रभावित हुआ। हालांकि बाद में गेहूं के निर्यात पर रोक लगाई गई।



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जरूरत से अधिक उत्पादन

संसद में केंद्रीय कृषि मंत्री की ओर से प्रदान की गई जानकारी के अनुसार भारत अपनी घरेलू जरूरत से ज्यादा गेहूं का उत्पादन करता है, इसलिए भी देश में गेहूं का कोई संकट नहीं है।

नेता प्रतिपक्ष ने पूछा था सवाल

केंद्रीय मंत्री तोमर ने राज्य सभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा पूछे गए एक सवाल के लिखित जवाब में यह जानकारी प्रदान की।

तीसरा अग्रिम अनुमान

तोमर ने तीसरे अग्रिम अनुमान की भी जानकारी सदन मेंं प्रदान की। कृषि मंत्री के अनुसार साल 2021-22 के दौरान 10.64 करोड़ टन गेहूं का उत्पादन होने का अनुमान लगाया गया है। यह पिछले पांच सालों (वर्ष 2016-17 से 2020-21) के दौरान उत्पादित गेहूं के औसत उत्पादन (10.38 करोड़ टन) से ज्यादा है। कृषि मंत्री ने बताया कि, देश की समग्र खाद्य सुरक्षा के प्रबंधन और पड़ोसी एवं कमजोर देशों की सहायता करने के लिए केंद्र सरकार ने गेहूं की निर्यात नीति में आवश्यक संशोधन किए हैं।



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एमएसपी से अधिक कीमत

सदन को दी गई जानकारी में केंद्रीय कृषि मंत्री तोमर ने बताया कि, गेहूं की मौजूदा कीमत गेहूं के MSP या न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी अधिक है।

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निर्यात से प्रभाव नहीं

गेहूं पर निर्यात संबंधी रोक के बारे में उन्होंने कहा कि, गेहूं पर निर्यात से किसानों की कृषि आय पर किसी तरह का बुरा असर नहीं पड़ा है। ऐसा इसलिए क्योंकि, गेहूं के एक्सपोर्ट पर प्रतिबंध के बावजूद गेहूं उत्पादक कृषकों को अच्छा एवं लाभकारी मूल्य प्राप्त हो रहा है। गौरतलब है कि देश में समग्र खाद्य सुरक्षा का प्रबंधन करने एवं पड़ोसी और कमजोर देशों को खाद्य मदद प्रदान करने के लिए भारत की केंद्रीय सरकार ने इस वर्ष 13 मई को गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लागू कर दिया था।

निर्यात विशिष्ट स्थिति में

सदन को दी गई जानकारी के अनुसार गेहूं निर्यात पर रोक कुछ स्थितियों में शिथिल भी की जा सकती है। राज्य सरकारों के अनुरोध एवं केंद्र सरकार द्वारा दी गई अनुमति के आधार पर जरूरतमंद देशों की खाद्य सुरक्षा जरूरतों की पूर्ति के लिए निर्यात की अनुमति दी जाएगी। आपको ज्ञात हो कि, वित्त वर्ष 2021-22 में भारत ने रिकॉर्ड 70 लाख टन गेहूं का निर्यात किया।

दुनिया को दिशा देने वाली हो भारतीय कृषि – तोमर कृषि मंत्री

दुनिया को दिशा देने वाली हो भारतीय कृषि – तोमर कृषि मंत्री

कृषि क्षेत्र में तकनीकों का उपयोग बढ़ाते हुए गांवों में ढांचागत विकास की दिशा में सरकार सतत संलग्नत है। सरकार खेती में रोजगार के अवसर बढाते हुए शिक्षत युवाओं को आकर्षित करना चाहती है ताकि युवाओं का ग्रामीण अंचल से पलायन रोका जा सके। खेती में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और पढ़े-लिखे युवा गांवों में ही रहकर कृषि की ओर आकर्षित होंगे। टेक्नालाजी व इंफ्रास्ट्रक्चर का लाभ किसानों को होगा, साथ ही कृषि के क्षेत्र को और सुधारने में कामयाबी मिलेगी। यह विचार कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर (Union Minister of State for Agriculture and Farmer Welfare Narendra Singh Tomar) ने बीते दिनों व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि “जब देश की आजादी के 100 वर्ष पूरे होंगे, यानी आजादी के अमृत काल तक भारतीय कृषि सारी दुनिया को दिशा देने वाली होनी चाहिए। अमृत काल में हिंदुस्तान की कृषि की विश्व प्रशंसा करे, लोग यहां ज्ञान लेने आएं, ऐसा हमारा गौरव हों, विश्व कल्याण की भूमिका निर्वहन करने में भारत समर्थ हो,” ।

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केंद्रीय मंत्री श्री तोमर ने यह बात भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर - ICAR) द्वारा आयोजित व्याख्यान श्रंखला की समापन कड़ी में कही। “प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से उद्बोधन में भी कृषि क्षेत्र को पुनः महत्व दिया है, जो इस क्षेत्र में तब्दीली लाने की उनकी मंशा प्रदर्शित करता है। पीएम ने आह्वान किया था कि किसानों की आय दोगुनी होनी चाहिए, कृषि में टेक्नालाजी का उपयोग व छोटे किसानों की ताकत बढ़नी चाहिए, हमारी खेती आत्मनिर्भर कृषि में तब्दील होनी चाहिए, पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर होना चाहिए, कृषि की योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता होनी चाहिए, अनुसंधान बढ़ना चाहिए, किसानों को महंगी फसलों की ओर जाना चाहिए, उत्पादन व उत्पादकता बढ़ने के साथ ही किसानों को उनकी उपज के वाजिब दाम मिलना चाहिए।

पीएम के इस आह्वान पर राज्य सरकारें, किसान भाई-बहन, वैज्ञानिक पूरी ताकत के साथ जुटे हैं और इसमें आईसीएआर (ICAR - Indian Council of Agricultural Research) की भी प्रमुख भूमिका हो रही है। पिछले दिनों में किसानों में एक अलग प्रकार की प्रतिस्पर्धा रही है कि आमदनी कैसे बढ़ाई जाएं, साथ ही पीएम श्री मोदी के आह्वान के बाद कार्पोरेट क्षेत्र को भी लगा कि कृषि में उनका योगदान बढ़ना चाहिए,” उन्होंने कहा। एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर फंड योजना के दिशानिर्देशों का पूरा सरकारी दस्तावेज पढ़ने या पीडीऍफ़ डाउनलोड के लिए, यहां क्लिक करें श्री तोमर ने कहा कि “खाद्यान्न की अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ अन्य देशों को भी उपलब्ध करा रहे हैं। यह यात्रा और बढ़े, इसके लिए भारत सरकार प्रयत्नशील है। खेती व किसानों को आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाना है। 

आईसीएआर व कृषि वैज्ञानिकों ने कृषि के विकास में बहुत अच्छा काम किया है। उनकी कोशिश रही है कि नए बीजों का आविष्कार करें, उन्हें खेतों तक पहुंचाएं, उत्पादकता बढ़े, नई तकनीक विकसित की जाएं और उन्हें किसानों तक पहुंचाया जाएं। जलवायु अनुकूल बीजों की किस्में, फोर्टिफाइड किस्में जारी करना इसमें शामिल हैं। सभी क्षेत्रों में वैज्ञानिकों ने कम समय में अच्छा काम किया, जिसका लाभ देश को मिल रहा है। आईसीएआर बहुत ही महत्वपूर्ण संस्थान हैं, जिसकी भुजाएं देशभर में फैली हुई हैं। कृषि की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संस्थान लगा हुआ है।


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किसानों की माली हालत सुधारना हमारे लिए महत्वपूर्ण है। इसके लिए 6,865 करोड़ रुपये के खर्च से दस हजार नए कृषक उत्पादक संगठन (एफपीओ) बनाना शुरू किया गया है। इनमें से लगभग तीन हजार एफपीओ बन भी चुके हैं। इनके माध्यम से छोटे-छोटे किसान एकजुट होंगे, जिससे खेती का रकबा बढ़ेगा और वे मिलकर तकनीक का उपयोग कर सकेंगे, अच्छे बीज थोक में कम दाम पर खरीदकर इनका उपयोग कर सकेंगे, वे आधुनिक खेती की ओर अग्रसर होंगे, जिससे उनकी ताकत बढ़ेगी और छोटे किसान आत्मनिर्भर बन सकेंगे। 

श्री तोमर ने कहा कि कृषि क्षेत्र में निजी निवेश के लिए सरकार ने एक लाख करोड़ रुपये के इंफ्रास्ट्रक्चर फंड का प्रावधान किया है। साथ ही अन्य संबद्ध क्षेत्रों को मिलाकर डेढ़ लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का फंड तय किया गया है। एग्री इंफ्रा फंड (Agri Infra Fund) के अंतर्गत 14 हजार करोड़ रु. के प्रोजेक्ट आ चुके हैं, जिनमें से 10 हजार करोड़ रु. के स्वीकृत भी हो गए हैं। सिंचाई के साधनों में भी बढ़ोत्तरी हो रही है, जल सीमित है इसलिए सूक्ष्म सिंचाई पर फोकस है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना का लाभ आम किसानों तक पहुंचाने के लिए सूक्ष्म सिंचाई कोष 5 हजार करोड़ रु. से बढ़ाकर 10 हजार करोड़ रु. किया गया है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि छोटे किसानों के लिए वरदान साबित हुई है। इस स्कीम में अभी तक लगभग साढ़े 11 करोड़ किसानों के बैंक खातों में 2 लाख करोड़ रु. से ज्यादा राशि जमा कराई जा चुकी हैं। 

Source : PIB (Press Information Bureau) Government of India आजादी का अमृत महोत्सव में केंद्रीय कृषि मंत्री के उद्बोधन के साथ संपन्न हुई आईसीएआर की 75 व्याख्यानों की श्रंखला का पूरा सरकारी दस्तावेज पढ़ने के लिए, यहां क्लिक करें प्रारंभ में आईसीएआर के महानिदेशक डा. हिमांशु पाठक ने स्वागत भाषण दिया। संचालन उप महानिदेशक डा. आर.सी. अग्रवाल ने किया।

आयात पर निर्भरता घटाएं वैज्ञानिक:कृषि मंत्री

आयात पर निर्भरता घटाएं वैज्ञानिक:कृषि मंत्री

केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कृषि विकास में कृषि वैज्ञानिकों के प्रयासों की सराहना की; कहा, उन्हें सुनिश्चित करना है कि अनुबंधित कृषि का लाभ छोटे किसानों को भी मिले आयात पर निर्भरता घटाने, स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थों का उत्पादन बढ़ाने की जरूरत  है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने आज अपना 92 वां स्थापना दिवस मनाया। इस अवसर पर केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कृषि वैज्ञानिकों की सराहना की, जिनके कारण आईसीएआर ने पिछले नौ दशकों के दौरान देश में कृषि के विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया है। उन्होंने कहा कि अनुसंधान में वैज्ञानिकों के अंशदान और किसानों की कड़ी मेहनत के चलते भारत आज अतिरिक्त खाद्यान्न उत्पादन वाला देश बन गया है। उन्होंने कोविड-19 महामारी के चलते लागू लॉकडाउन के दौरान भी फसलों के रिकॉर्ड उत्पादन के लिए देश के किसानों को बधाई दी। श्री तोमर ने वैधानिक संशोधन और अध्यादेशों की घोषणा के द्वारा बहुप्रतीक्षित कृषि सुधारों को लागू करने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति भी आभार प्रकट किया है, जिससे किसान सशक्त होंगे और उन्हें अपनी फसल का लाभकारी मूल्य हासिल करने में सहायता मिलेगी। उन्होंने कहा कि आईसीएआर और केवीके के वैज्ञानिकों को यह भी सुनिश्चित करना है कि अनुबंधित कृषि का लाभ छोटे किसानों को भी मिले। आयात पर निर्भरता घटाएं वैज्ञानिक:कृषि वैज्ञानिकों को संबोधित करते हुए केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि 10 दशक में पूसा संस्थान (आईएआरआई) एक राष्ट्रीय संस्थान से अंतरराष्ट्रीय स्तर के संस्थान में तब्दील हो गया है। उन्होंने कहा कि आयात पर निर्भरता कम करने, स्वास्थ्यवर्धक उत्पादों के साथ ही दालों व तिलहनों का उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता है। श्री तोमर ने कहा कि अनुसंधान के द्वारा पाम ऑयल का उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता है। उन्होंने तिलहन की नई किस्में ईजाद करने पर भी जोर देते हुए कहा कि दलहन उत्‍पादन में हम आत्मनिर्भरता हासिल करने के करीब हैं और उम्मीद है कि तिलहन के मामले में भी हम ऐसी ही सफलता को दोहराएंगे और खाद्य तेलों के आयात पर होने वाले खर्च में कमी ला पाएंगे। इस अवसर पर 8 नए उत्पादों का लोकार्पण और 10 प्रकाशनों का विमोचन किया गया। केन्द्रीय कृषि राज्य मंत्री पुरुषोत्तम रूपाला और कैलाश चौधरी, आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. त्रिलोचन महापात्रा, आईसीएआर के कई वैज्ञानिक और अधिकारी भी इस अवसर पर उपस्थित रहे। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार के तहत आने वाले कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग (डीएआरई) के अंतर्गत आने वाला स्वायत्त संस्थान है। सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के अंतर्गत पंजीकरण सोसायटी के रूप में 16 जुलाई, 1929 को इसकी स्थापना की गई थी। परिषद देश भर में बागवानी, मत्स्य पालन और पशु विज्ञान सहित कृषि में अनुसंधान एवं शिक्षा के समन्वय, मार्गदर्शन और प्रबंधन करने वाली सर्वोच्च संस्था है। देशभर के 102 आईसीएआर संस्थान व राज्यों के 71 कृषि विश्वविद्यालयों के साथ यह दुनिया में सबसे बड़ी राष्ट्री कृषि प्रणालियों में से एक है। आईसीएआर ने हरित क्रांति को बढ़ावा देने और इस क्रम में शोध एवं तकनीक विकास के माध्यम से भारत में कृषि विकास में अहम भूमिका निभाई है। राष्ट्र की खाद्य और पोषण सुरक्षा पर इसका प्रभाव स्पष्ट दिखाई दे रहा है। इसने कृषि में उच्च शिक्षा में उत्कृष्टता को प्रोत्साहन देने में प्रमुख भूमिका निभाई है। भारतीय कृषि एवं अनुसंधान परिषद हर साल संस्थानों, वैज्ञानिकों, शिक्षकों और कृषि पत्रकारों को मान्यता और पुरस्कार भी देता रहा है। इस साल 20 विभिन्न श्रेणियों के अंतर्गत लगभग 160 पुरस्कारों के लिए लोगों और संस्थानों का चयन किया गया। इनमें तीन संस्थान, दो एआईसीआरपी, 14 केवीके, 94 वैज्ञानिक, 31 किसान, 6 पत्रकार और विभिन्न आईसीएआर संस्थानों के 10 कर्मचारी शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि पुरस्कार हासिल करने वाले 141 लोगों में 19 महिलाएं हैं। कृषि विश्वविद्यालयों और डीम्ड विश्वविद्यालयों में गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर को शिक्षण, शोध, विस्तार और नवाचार जैसे सभी क्षेत्रों में तेज प्रगति के लिए सर्वश्रेष्ठ कृषि विश्वविद्यालय, आईसीएआर- केन्द्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान कोच्चि को बड़े संस्थान की श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ संस्थान का पुरस्कार, वहीं आईसीएआर- केन्द्रीय कपास प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान मुंबई को छोटे आईसीएआर संस्थानों की श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ आईसीएआर संस्थान के पुरस्कार के लिए चुना गया। सोरघुम, हैदराबाद पर अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना और मक्का, लुधियाना पर अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना को संयुक्त रूप से चौधरी देवी लाल उत्कृष्ट अखिल भारतीय अनुसंधान परियोजना पुरस्कार के लिए चुना गया। राष्ट्रीय स्तर पर केवीके के लिए दीन दयाल उपाध्याय कृषि विज्ञान प्रोत्साहन पुरस्कार के लिए जिले के कृषि तथा संबंधित क्षेत्रों के विकास पर विशिष्ट प्रभाव को चलाई गई उल्लेखनीय विस्तार/ आउटरीच गतिविधियों के लिए संयुक्त रूप से कृषि विज्ञान केन्द्र, दतिया, मध्य प्रदेश और कृषि विज्ञान केन्द्र, वेंकटरमन्नागुडेम, आंध्र प्रदेश का चयन किया गया। कृषि पत्रकारिता, 2019 के लिए छह पत्रकारों को चौधरी चरण सिंह पुरस्कार दिया गया, जिनमें 4 प्रिंट और 2 इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से थे।
२०२२-२३ के लिए कृषि यंत्रों पर अनुदान प्राप्त करने के लिए आवेदन की प्रकिया जारी : डा. कर्मचंद, हरियाणा

२०२२-२३ के लिए कृषि यंत्रों पर अनुदान प्राप्त करने के लिए आवेदन की प्रकिया जारी : डा. कर्मचंद, हरियाणा

कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के उपनिदेशक डा. कर्मचंद ने बताया कि किसानों के लिए 2022-23 स्कीम के तहत अनुदान देने के लिए विभिन्न कृषि यंत्रों पर विभाग के द्वारा आवेदन स्वीकार किए जा रहे हैं। कृषि यंत्रों में इच्छुक किसान इस योजना का लाभ लेने के विभागीय पोर्टल पर 27 मई तक आनलाइन आवेदन कर सकते हैं। 

ये भी देखें: भूमि विकास, जुताई और बीज बोने की तैयारी के लिए उपकरण 

२०२२-२३ के लिए कृषि यंत्रों पर अनुदान के तहत, श्री डॉ कर्म चंद बताया कि विभाग द्वारा कृषि यंत्रों जैसे- काटन सीड ड्रिल, ट्रैक्टर माउंटेड स्प्रे पंप, डायरेक्ट सीडेड राइस मशीन, ट्रैक्टर माउंटेड रोटरी वीडर (दो से तीन रो), पावर टीलर (12 एचपी से अधिक), ब्रिक्वेट मेकिग मशीन, रीपर बाइंडर स्वचालित, मेज प्लांटर, मेज थ्रेसर, न्यूमेटिक प्लांटर पर आवेदन स्वीकार किए जा रहे हैं। इसमें व्यक्तिगत व सामान्य श्रेणी में अधिकतम 40 प्रतिशत व अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, छोटे व सीमांत किसान और महिला किसान के लिए 50 प्रतिशत अनुदान दिया जाएगा। 

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डा. कर्मचंद ने बताया कि २०२२-२३ के लिए कृषि यंत्रों पर अनुदान के लाभ लेने के इच्छुक किसान को मेरी फसल मेरा ब्यौरा पोर्टल पर अपना पंजीकरण कराना होगा, जिसके लिए किसान को एक शपथ पत्र व एक स्वयं घोषणा पत्र जमा करवाना होगा। वहीं आनलाइन आवेदन के लिए किसान के नाम जिला में पंजीकृत ट्रैक्टर की वैध आरसी (केवल ट्रैक्टर चालित यंत्रों के लिए) परिवार पहचान पत्र, बैंक खाता तथा आधार कार्ड की आवश्यकता होगी। 

इसके अलावा, एक किसान किसी भी तरह के अधिकतम तीन कृषि यंत्र ही ले सकता है और जिन किसानों ने पिछले पांच वर्षों में इन कृषि यंत्रों पर अनुदान लिया है वे इस स्कीम में उस कृषि यंत्र पर आवेदन करने के पात्र नहीं होंगे। आनलाइन आवेदन करने के लिए किसान को ढाई लाख से कम कीमत के यंत्रों के लिए 2500 रूपए एवं ढाई लाख या उससे अधिक कीमत के यंत्रों के लिए 5000 रुपये टोकन राशि अलग-अलग आनलाइन ही जमा करवानी होगी, जो कि चयन प्रक्रिया के पश्चात किसान के खाते में वापिस जमा करवा दी जाएगी। इस बारे में अधिक जानकारी के लिए उप निदेशक, कृषि एवं किसान कल्याण विभाग में संपर्क किया जा सकता है।  

1277 किसानों ने खंडवा में प्राकृतिक खेती के लिए पोर्टल पर करवाया पंजीकरण

1277 किसानों ने खंडवा में प्राकृतिक खेती के लिए पोर्टल पर करवाया पंजीकरण

खंडवा जिले में नर्मदा नदी को प्रदूषण से बचाने के लिए प्राकृतिक खेती करना आवश्यक है. मध्यप्रदेश सरकार ने प्राकृतिक खेती में इच्छुक किसानों के लिए एक वेबसाइट बनाई है. जो भी किसान प्राकृतिक खेती के लिए रजिस्ट्रेशन करना चाहता है वो प्राकृतिक कृषि पद्धति - किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग मध्यप्रदेश  के आधिकारिक वेबसाइट: http://mpnf.mpkrishi.org/ पर जाकर रजिस्ट्रेशन करवा सकते है.

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प्राकृतिक खेती के लिए खंडवा जिले से 1277 किसान, खरगोन से 2052, बड़वानी जिले से 2130 किसान प्राकृतिक खेती के लिए आगे आए. 1223 कृषि अधिकारी, कर्मचारी व किसानों को प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए शामिल किया गया है.

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करोड़ों रुपए बचेंगे कीटनाशक, खाद के कम इस्तमाल से

जैसा कि हम सब जानते है की आज - कल खेती में खाद और कीटनाशकों का इस्तमाल होता है. खाद और कीटनाशक खरीदने के लिए रुपए भी लगते है. कृषि अधिकारियों के मुताबिक ये लगभग 9000-9500 रुपए प्रति हेक्टेयर खाद के लिए और 4000-5000 कीटनाशक के लिए लगते है. यदि दोनों को मिलाया जाए तो ये लगभग 1400-1500 रुपए होते है. यही पूरे जिले का मिलाए तो करोड़ों होते है. वहीं यदि इसका इस्तमाल कम कर दिया जाए तो करोड़ों का फायदा होगा.

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कितने किसानों ने कौन - कौन जिले से पंजीकरण करवाया है

इस योजना में बहुत से किसानों ने अपना सहयोग दिखाया है. जैसे- इंदौर से 1567, बुरहानपुर से 684, खरगोन से 2052, बड़वानी से 2130, खंडवा से 1277, धार से 836, आलीराजपुर से 1389, झाबुआ से 958. कुल मिलाकर - 10893 किसानों ने प्राकृतिक खेती के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया.  

हरियाणा में खेतो की बिजली के समय को बढ़ाकर 7 घंटे कर दिया गया है

हरियाणा में खेतो की बिजली के समय को बढ़ाकर 7 घंटे कर दिया गया है

पानीपत में बिजली के कम सप्लाई के कारण किसान खेत में हरे चार, तिलहन व सब्जी की ठीक से सिंचाई नहीं कर पाते है. ऐसे में किसानों ने खेती फीडर में ज्यादा सप्लाई के लिए कई बार एसडीओ से लेकर एस ई तो से मांग की थी. धर्मवीर छिक्कारा जो कि पनीपत के एस ई है, उन्होंने बताया कि उत्तर हरियाणा बिजली निगम ने खेती फीडर की सप्लाई 5 घंटे से बढ़ाकर 7 घंटे कर दिया है. इसके लिए निगम ने 3 ग्रुप में शेड्यूल तैयार किया है. पहला ग्रुप में देर रात 2 बजे से सुबह 9 बजे तक. दूसरा ग्रुप में सुबह 6 बजे से दोपहर 1 बजे तक. तीसरा ग्रुप दोपहर 1 बजे से शाम 8 बजे तक बिजली सप्लाई रहेगी.

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हर डिवीजन में सहूलियत के हिसाब से फीडरो पर सप्लाई दी जाएगी, परंतु ये निर्धारित शेड्यूल के हिसाब से होगा जिससे किसानों को कोई दिक्कत ना हो. इससे पहले बिजली कम आने के कारण खेती फीडर में सप्लाई दो से तीन घंटे मिलती थी. जिसे बाद में बढ़ाकर पांच घंटे कर दिया गया. अब सात घंटे दी जाएगी. किसान 15 जून से कर पाएंगे धान रोपाई

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15 जून से पहले कृषि और किसान कल्याण विभाग की तरफ से पहले धान की रोपाई पर रोक लगा रखी है. 15 जून के बाद किसान धान रोपाई कर सकेंगे. दूसरी ओर किसान भी समय को नजदीक आता देख तैयारी में जुटे है. धान की पौध भी तैयार हो चुकी है. खेत की जुताई के साथ मेड़ भी बनाई जा रही है. सीजन को देखते हुए बिजली निगम की ओर से सप्लाई को दो घंटे और बढ़ा दिया गया है. एक बार किसान को पूरी सप्लाई मिल जाए फिर किसान को खेत तैयार करने में ज्यादा दिक्कत नही आयेगी.
राजस्थान सरकार देगी निशुल्क बीज : बारह लाख किसान होंगे लाभान्वित

राजस्थान सरकार देगी निशुल्क बीज : बारह लाख किसान होंगे लाभान्वित

राजस्थान सरकार पहली बार कृषि के उत्थान के लिए अलग से कृषि बजट लाई है. इस बजट में मिलेट प्रमोशन मिशन के लिए 100 करोड़ का प्रावधान किया गया है. इसके तहत फसल सुरक्षा मिशन के जरिए एक करोड़ पच्चीस लाख मीटर मे तारबंदी के लिए सहायता दी जाएगी, वहीं फसलों को आवारा पशुओं से बचाने के लिए हर गांव में एक नंदी शाला बनाने की योजना भी लाई गई है. जैविक खेती मिशन शुरू की जाएगी और साथ ही कस्टम हायरिंग सेंट्रल को १००० ड्रोन दिए जाने का प्रावधान किया गया है. अब होगी ड्रोन से राजस्थान में खेती, किसानों को सरकार की ओर से मिलेगी 4 लाख की सब्सिडी राजस्थान के कृषि बजट में की गई घोषणाओं को लेकर सरकार किसानों के बीच जा रही है और पूरी जानकारी दे रही है. जयपुर के दुर्गापुरा कृषि अनुसंधान केंद्र में बजट की घोषणाओं को लेकर एक कार्यक्रम भी आयोजित किया गया. कार्यक्रम में किसानों को जानकारी दी गई कि अभी तक १५००० मूंग और ४२००० संकर बाजरा के बीजों का निशुल्क वितरण किसानों के बीच किया गया है. कार्यक्रम में जयपुर के अतिरिक्त जिला कलेक्टर अशोक कुमार शर्मा ने बताया कि किस प्रकार अलग से पेश किए गए इस बजट के प्रावधानों का किसानों को लाभ मिलेगा और इससे उत्पादकता बढ़ेगी. खेती किसानी को बढ़ाने के लिए राजस्थान सरकार द्वारा १२ लाख लघु एवं सीमांत किसानों को निशुल्क बीज मुहैया कराई जानी है. इसके तहत ८ लाख संकर मक्का मिनीकट, १० लाख बाजरा, २.७४ लाख मूंग, २६३१५ मोठ, ३१२७५ उड़द एवं १ लाख ढेंचा बीज का किसानों के बीच मुफ्त में वितरण किया जाना है, जिससे छोटे एवं सीमांत किसानों के बीज को लेकर हो रही परेशानी समाप्त हो जाएगी. साथ ही खेती की लागत में भी कमी आएगी और आय में वृद्धि होगी.

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रबी या खरीफ किसी भी सीजन में किसानों को अच्छी बीज प्राप्त करने में काफी समस्या आती है. पैसा खर्च करने के बाद भी कई बार ऐसा होता है कि उन्हें नकली बीज मिलता है, जिससे फसल अच्छी नहीं होती और किसानों को आर्थिक नुकसान भी होता है. मौके पर कृषि पदाधिकारियों ने बताया कि २०२२ - २३ के कृषि बजट में किसान कल्याण कोष की रकम को दो हजार करोड़ से बढ़ाकर पांच हजार करोड़ रूपया कर दिया गया है. कृषि साथी योजना के अंतर्गत ११ मिशन चलाए जाएंगे, जिसके लिए प्रशासनिक स्वीकृति भी दे दी गई है. कई काम आरंभ भी किए जा चुके हैं. फार्म पॉन्ड और डिग्गी निर्माण में किसान रुचि ले रहे हैं. वही ग्रीन हाउस, शेड नेट हाउस, लोड टलन के लिए भी बड़ी मात्रा में किसानों का आवेदन प्राप्त हो रहा है.

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जयपुर में आयोजित इस सेमिनार में अधिकारियों ने बताया कि जिले में २० समुदायिक जल स्रोतों की स्थापना हो चुकी है. सांगानेर, बगरू, शाहपुरा में नवीन मंडी और मिनी फूड पार्क के लिए निशुल्क भूमि आवंटन का काम जारी है. वही सेमिनार में उपस्थित प्रतिभागियों ने बताया यह राज्य में ११४ नए दुग्ध उत्पादन सहकारी समितियों का पंजीकरण हुआ है, जिसमें केवल जयपुर में ६० समितियां है. इंदिरा गांधी नहर परियोजना में लगभग एक हजार छह सौ करोड़ रुपए की लागत से जीर्णोधार एवं सिंचाई संबंधी कार्य किया जा रहा है.
हरियाणा फसल विविधीकरण योजना के लिए लक्ष्य निर्धारित

हरियाणा फसल विविधीकरण योजना के लिए लक्ष्य निर्धारित

भूजल स्तर में गिरावट का निदान

धान छोड़ने वाले किसान का सम्मान

फसल विविधता के लिए लक्ष्य निर्धारित

हरियाणा प्रदेश सरकार ने राज्य में क्रॉप डायवर्सिफिकेशन (Crop Diversification) यानी फसल विविधीकरण के लिए हरियाणा फसल विविधीकरण योजना (मेरा पानी मेरी विरासत - Mera Pani Meri Virasat) शुरू की है। हरियाणा क्रॉप डायवर्सिफिकेशन स्कीम (Haryana Crop Diversification Scheme) अर्थात हरियाणा फसल विविधीकरण योजना के तहत, धान की पारंपरिक फसल छोड़ने वाले किसानों को सरकार द्वारा प्रोत्साहित किया जाएगा।
हरियाणा फसल विविधीकरण योजना के सरकारी दस्तावेज (अंग्रेजी में) पढ़ने या पीडीऍफ़ डाउनलोड के लिए, यहां क्लिक करें
इस स्कीम के तहत धान जैसी पारंपरिक फसल त्यागने का निर्णय लेने वाले किसानों को प्रति एकड़ 7 हजार रुपये की राशि बतौर प्रोत्साहन प्रदान की जाती है। राज्य सरकार मक्का उगाने वाले किसानों को 2400 रुपये प्रति एकड़ और दलहन (मूंग, उड़द, अरहर) की पैदावार करने वाले कृषकों को 3600 रुपये प्रति एकड़ के मान से अनुदान राशि प्रदान करती है।


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आपको बता दें हरियाणा सरकार की ओर से फसल विविधीकरण स्कीम (Haryana Crop Diversification Scheme) के तहत यह प्रोत्साहन राशि किसान को सिर्फ 5 एकड़ की कृषि भूमि के लिए ही प्रदान की जाती है। राज्य सरकार द्वारा साल 2022 के लिए निर्धारित लक्ष्य के अनुसार प्रदेश की 50 हज़ार एकड़ कृषि भूम पर योजना का लाभ प्रदान किया जाएगा।

स्कीम का कारण

हरियाणा प्रदेश में किसानों द्वारा एक सी फसल उगाने के कारण खेतों की पैदावार क्षमता प्रभावित हो रही है। एक जैसे रसायनों एवं कीटनाशकों के सालों से हो रहे प्रयोग के कारण कृषि भूमि की उर्वरता भी खतरे में है। साथ ही राज्य में भूजल स्तर में भी गिरावट देखी जा रही है।


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इन सभी समस्याओं के मूलभूत उपचार फसल विविधीकरण के तरीके को अपनाते हुए सरकार ने हरियाणा फसल विविधीकरण स्कीम को बतौर प्रोत्साहन राज्य में लागू किया है।

फसल बदलने प्रोत्साहन

फसल विविधीकरण स्कीम में सालों से चली आ रही एक सी फसल उगाने की परंपरा के बजाए किसानों को बदल-बदल कर कृषि भूमि, पर्यावरण एवं मानव स्वास्थ्य उपयोगी फसल उगाने के लिए प्रेरित किया जाता है। इस योजना के जरिए प्रदेश में धान की खेती के बजाए दूसरी खेती फसल अपनाने वाले किसानों को प्रोत्साहन राशि प्रदान की जाती है।

अनुदान का प्रबंध

अन्य फसलों जैसे कपास, मक्का, दलहन, ज्वार, अरंडी, मूंगफली, सब्जी एवं फल आदि की किसानी करने वाले किसानों को अनुदान राशि भी प्रदेश में प्रदान की जा रही है।

योजना का उद्देश्य

हरियाणा प्रदेश सरकार ने हरियाणा फसल विविधीकरण योजना को लागू करने का निर्णय, राज्य में भूजल की बढ़ती परेशानी के निदान के लिए लिया है। धान की खेती में बहुत मात्रा में पानी की जरूरत होती है। मूल तौर पर धान की किसानी की वजह से प्रदेश के भूजल स्तर में चिंतनीय गिरावट देखी गई है।


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इस समस्या के प्राकृतिक समाधान के तहत प्रदेश में फसल विविधीकरण के लक्ष्य को निर्धारित किया गया है। क्रॉप डायवर्सिफिकेशन स्कीम से प्रदेश में अन्य फसलों की खेती तरीकों में भी वृद्धि होगी। इससे भूजल गिरावट की समस्या का भी समाधान हो सकेगा

चावल पीता है पानी

कृषि अनुसंधान के अनुसार 1 किलोग्राम चावल की पैदावार के लिए औसतन 300 लीटर पानी लगता है। इस खपत को नियंत्रित करने के लिए हरियाणा सरकार ने फसल विविधीकरण के लक्ष्य पर काम करना शुरू किया है, ताकि घट रहे भूजलस्तर की समस्या का समय रहते प्राकृतिक तरीके से समाधान किया जा सके।

अंतिम तारीख 31 अगस्त

हरियाणा फसल विविधीकरण योजना 2022 के तहत योजना संबंधी आवेदन जमा करने की प्रदेश सरकार ने अंतिम समय सीमा 31 अगस्त 2022 तय की है। इसके लिए आवेदक को आधार कार्ड क्रमांक से संबद्ध बैंक खाता संबंधी जानकारी आवेदन पत्र में दर्शानी होगी। योजना के पात्र हितग्राही आवेदक को राज्य सरकार की ओर से दी जाने वाली प्रोत्साहन धन राशि उसके बैंक खाते में जमा की जाएगी।

कृषि यंत्र अनुदान

हरियाणा फसल विविधीकरण योजना (Haryana Crop Diversification Scheme) के जरिये सरकार द्वारा किसानों को कृषि यंत्र खरीदने के लिए अनुदान भी प्रदान किया जाएगा।

योजना इनके लिए है

हरियाणा फसल विविधीकरण योजना का लाभ प्रदेश के निवासी को ही प्रदान किया जाएगा। योजना के अनुसार कृषक को पिछले वर्ष की तुलना में धान के रकबे के कम से कम 50% हिस्से में दूसरी फसलों की पैदावार करना होगी।


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इसके अलावा बैंक खाता, आधार कार्ड, निवास प्रमाण पत्र, कृषि योग्य भूमि संबंधी दस्तावेज, पहचान पत्र, मोबाइल नंबर, बैंक खाता विवरण,

पासपोर्ट साइज फोटो भी आवेदक को योजना के लिए दर्शाना होगी।

हरियाणा फसल विविधीकरण योजना के अंतर्गत रजिस्ट्रेशन कराने के लिए कृषक मित्र, कृषि एवं किसान कल्याण विभाग हरियाणा की आधिकारिक वेबसाइट पर पंजीकरण करा सकते हैं।
कृषि मशीनों पर सब्सिडी दे रही बिहार सरकार, 31 दिसंबर तक करें आवेदन

कृषि मशीनों पर सब्सिडी दे रही बिहार सरकार, 31 दिसंबर तक करें आवेदन

जब से बिहार में सरकार बदली है, उसके बाद से नीतिश कुमार छात्रों ही नहीं, किसानों पर भी बड़े मेहरबान नजर आ रहे हैं। खेती में मशीनों का इस्तेमाल आज कल बेहद जरूरी हो गया है, क्योंकि इनके उपयोग से ही किसान अपना ज्यादा काम कम समय में कर पाते हैं। इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए बिहार सरकार ने कृषि मशीनों पर सब्सिडी देने का ऐलान किया है। इस सब्सिडी का असर ये होगा कि जो किसान ज्यादा लागत की मशीन खरीदने में सक्षम नहीं हैं, वे भी इन्हें खरीद पाएंगे। गौर करने वाली बात है कि सरकार यह सब्सिडी 90 प्रकार की कृषि में इस्तेमाल होने वाली मशीनों पर दे रही है। सब्सिडी वाली मशीनों के लिए एप्लिकेशन प्रोसेस भी शुरू हो गया है। इच्छुक किसान इसके लिए 31 दिसंबर तक एप्लिकेशन दे सकते हैं


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किसानों को सब्सिडी पर कृषि यंत्र दे रही MP सरकार
इस योजना की शुरुआत बिहार के कृषि एवं किसान कल्याण विभाग ने की है। इस योजना का नाम कृषि यंत्रीकरण है। इसी योजना के अंतर्गत सरकार ने कृषि मशीनों पर सब्सिडी देने का ऐलान किया है। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर वे किस तरह की मशीनें हैं जिन पर सब्सिडी दी जा रही है, तो आपको बता दें कि इसके लिए कटाई, सिंचाई, गुडाई, निराई गन्ना और बागवानी से जुड़ी मशीनें शामिल हैं। अगर आपको इन सारी मशीनों की लिस्ट चाहिए और सब्सिडी के बारे में विस्तार से जानना है, तो आपको OFMAS पोर्टल (OFMAS - Online Farm Mechanization Application Software) पर जाना होगा। यहां आपका पूरा ब्योरा मिल जाएगा।

इस योजना को लेकर बिहार के कृषि विभाग ने ट्वीट किया था, जिसमें पूरा ब्योरा बताया गया था

लेकिन इस बीच गौर करने वाली बात है कि जो लोग पहले अप्लाई करेंगे तो उन्हें लाभ पहले मिलेगा, क्योंकि यह पूरा प्रक्रिया पहले आओ पहले पाओ के तहत है। चूंकि बिहार सरकार ने आवेदन आमंत्रित कर दिए हैं, इसलिए जरूरी है कि आप फौरन कृषि विभाग की वेबसाइट पर जाकर आवेदन कर दें ताकि आपका नंबर पहले लग सके। लेकिन आवेदन के पहले आपको पंजीकरण करना होगा, जो अनिवार्य है। बिहार सरकार ने इस योजना के लिए अच्छा खासा बजट जारी किया है। इसी बजट के अंर्तगत किसानों को कृषि मशीनों पर सब्सिडी दी जाएगी। बिहार में किसान अक्सर की मौसम की मार झेलते रहे हैं। ऐसे में सरकार का यह कदम कई मायनों में शानदार है। इस योजना से छोटे व मझोल किसानों को मदद मिलेगी।
पराली प्रदूषण से लड़ने के लिए पंजाब और दिल्ली की राज्य सरकार एकजुट हुई

पराली प्रदूषण से लड़ने के लिए पंजाब और दिल्ली की राज्य सरकार एकजुट हुई

पराली आज कल देश की विषम परिस्थिति एवं प्रदुषण का कारण बनी हुई है, शासन प्रशासन दोनों ही इस विषय से चिंतित है। पराली के जलाने से वायु प्रदुषण काफी मात्रा मे बढ़ता जा रहा है जो कई बिमारियों को बुलावा दे रहा है। पंजाब और दिल्ली राज्य सरकार इसको लेकर बेहद सजग है एवं इससे निपटने के लिए कदम से कदम मिलाकर साथ आ गए हैं, जिसकी जानकारी पंजाब राज्य सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री कुलदीप सिंह धालीवाल (Kuldeep Singh Dhaliwal) ने दी। धालीवाल जी ने अवगत कराया की राज्य सरकार परस्पर सहमति एवं सहयोग से पराली समस्या (यानी फसल अवशेष or Crop residue) से निजात पाने की दिशा में कार्य करने जा रही है। साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार पे भी निशाना साधते हुए कहा की केंद्र सरकार पूर्व में पराली से निपटने के लिए आर्थिक मदद देने के वादे से मुकर गयी है। दिल्ली राज्य सरकार के मुख्यमंत्री श्री अरविन्द केजरीवाल जी ने भी इस समस्या को गहन विचार विमर्श करते हुए प्राथमिकता दी है, क्यूंकि पराली के जलने के कारण दिल्ली का प्रदूषण काफी हद तक प्रभावित होता है। इससे दिल्ली की जनता को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। पूर्व में इस प्रकार के अनुभवों के कारण दिल्ली सरकार इस समस्या को काफी गंभीरता से ले रही है।

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पंजाब व दिल्ली सरकार किसानो के लिए ४५२ करोड़ की राशि, सब्सिडी वाले कृषि यंत्रों पर देने की घोषणा कर चुकी है। आप सरकार ५००० एकड़ जमीन पर पराली के लिए पूसा बायो डीकम्पोज़र के छिड़काव का उपयोग करेगी, जो कि प्रदुषण नियंत्रण में मुख्य भूमिका निभाएगा। सरकार पराली से सम्बंधित समस्या को हर हाल में दूर करने का भरपूर प्रयास कर रही है। सरकार आधुनिक कृषि यन्त्र एवं द्रव्य पदार्धों की सहायता भी लेगी। पंजाब में धान की खेती लगभग २९-३० लाख हेक्टेयर रकबे में होने का अनुमान है, जिससे अंदाजा है की २० मिलियन टन धान की पुआल पैदा हो सकती है। पंजाब सरकार ने इस समस्या को देखते हुए केंद्र सरकार से मदद मांगी थी, जिसमे केंद्र सरकार ने पंजाब और दिल्ली राज्य प्रत्येक को ३७५ करोड़ की मदद देने की बात संयुक्त प्रस्ताव में कही थी, जिसमे पंजाब व दिल्ली सरकार ने केंद्र से ११२५ का परिव्यय माँगा।

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भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI ) के माध्यम से लागू की जाने वाली पायलट परियोजना के अंतर्गत लगभग २०२३ हेक्टेयर भूमि पर सरकार द्वारा बायो डीकम्पोज़र का छिड़काव किया जायेगा, जिसमे धालीवाल जी ने कुछ जगहों पर मुफ्त में छिड़काव करने की भी बात कही। दिल्ली का वातावरण अत्यधिक यातायात व वाहनों के धुएं से प्रदूषित तो होता ही है, पराली जलाने के कारण और भी दूषित हो जाता है। दिल्ली व पंजाब सरकार किसान हित में योजना बनाने की तैयारी में है ,लेकिन इसके लिए राज्य सरकार के पास पर्याप्त धनकोष नहीं है। इसलिए पंजाब व दिल्ली राज्य सरकार को केंद्र से आर्थिक सहायता की आवश्यक्ता है, जिसके लिए केंद्र सरकार इंकार कर देती है। उपरोक्त में धालीवाल जी ने केंद्र पर आर्थिक मदद न करने का आरोप लगाया है।
देश में दलहन और तिलहन का उत्पादन बढ़ाने के प्रयास करेगी सरकार, देश भर में बांटेगी मिनी किट

देश में दलहन और तिलहन का उत्पादन बढ़ाने के प्रयास करेगी सरकार, देश भर में बांटेगी मिनी किट

इस साल देश के कई राज्यों में खरीफ की फसल मानसून की बेरुखी के कारण बुरी तरह से प्रभावित हुई है, जिसके कारण उत्पादन में भारी गिरावट आई है। उत्पादन में यह गिरावट किसानों की कमर तोड़ने के लिए पर्याप्त है, क्योंकि यदि किसान खरीफ की फसल में लाभ नहीं कमा पाए तो उनके लिए नई चुनौतियां खड़ी हो जाएंगी। इसके अलावा अगर किसानों के पास पैसा नहीं रहा तो किसानों के लिए रबी की फसल में बुआई करना मुश्किल हो जाएगा। बिना पैसों के खेती से जुड़ी चीजें जैसे कि खाद, बीज, कृषि उपकरण, डीजल इत्यादि सामान खरीदना किसानों के लिए मुश्किल हो जाएगा। किसानों की इन चुनौतियों को देखते हुए केंद्र सरकार किसानों की मदद करने जा रही है। केंद्र सरकार किसानों के लिए रबी सीजन में दलहन और तिलहन की फसलों का उत्पादन बढ़ाने के लिए मुफ्त मिनी किट वितरित करेगी। कृषि मंत्रालय के अधिकारियों और विशेषज्ञों का अनुमान है कि इससे देश भर में दलहन के उत्पादन में लगभग 20-25 फीसदी की वृद्धि की जा सकती है। इसको देखते हुए मिनी किट वितरण की रूप रेखा तैयार कर ली गई है। ये भी पढ़े: दलहनी फसलों पर छत्तीसढ़ में आज से होगा अनुसंधान देश भर में मिनी किट का वितरण भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ लिमिटेड (NAFED) के अंतर्गत आने वाली संस्था राष्ट्रीय बीज निगम - एनएससी (NSC) करेगी। इन मिनी किटों का भुगतान भारत सरकार अंतर्गत आने वाले राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तहत किया जाएगा। केंद्रीय कृषि व किसान कल्याण मंत्रालय की योजना के अनुसार इन मिनी किटों का वितरण उन्हीं राज्यों में किया जाएगा, जहां दलहन एवं तिलहन का उत्पादन किया जाता है।

इस योजना का उद्देश्य क्या है

केंद्रीय कृषि व किसान कल्याण मंत्रालय की तरफ से दी गई जानकारी के अनुसार, इस योजना का मुख्य उद्देश्य उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के साथ ही किसानों के बीच फसलों की नई किस्मों को लेकर जागरूक करना है, ताकि किसान इन मिनी किटों के माध्यम से नई किस्मों के प्रति आकर्षित हों और ज्यादा से ज्यादा रबी की बुआई में नई किस्मों का इस्तेमाल करें। इस योजना के अंतर्गत किसानों के बीच मिनी किटों में उच्च उत्पादन वाले बीजों का वितरण किया जाएगा। मिनी किटों का वितरण महाराष्ट्र के विदर्भ में रेपसीड और सरसों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए, साथ ही तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्यों में वहां की प्रमुख तिलहन फसल मूंगफली के उत्पादन को बढ़ाने के लिए तथा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान में अलसी और महाराष्ट्र, कर्नाटक और तेलंगाना में कुसुम (सूरजमुखी) का उत्पादन बढ़ाने के लिए किया जाएगा। ये भी पढ़े: तिलहनी फसलों से होगी अच्छी आय केंद्रीय कृषि व किसान कल्याण मंत्रालय ने इस साल देश भर के 11 राज्यों में दलहन की बुवाई बढ़ाने के लिए, उड़द के 4.54 लाख बीज मिनी किट और मसूर के 4.04 लाख बीज मिनी किट राज्यों को भेज दिए हैं। उत्तर प्रदेश के लिए सबसे ज्यादा 1,11,563 मिनी किट भेजे गए हैं, इसके बाद झारखण्ड के लिए 12,500 मिनी किट और बिहार के लिए 12,500 मिनी किट भेजे गए हैं। इसके अतिरिक्त कृषि मंत्रालय एक और योजना लागू करने जा रही है, जिसके अंतर्गत देश भर के 120 जिलों में मसूर और 150 जिलों में उड़द का उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा। इस योजना को विशेष कार्यक्रम '(TMU 370; टीएमयू 370) 'तूर मसूर उड़द - 370'' के नाम से प्रचारित किया जाएगा।
"केंद्र सरकार के रबी 2022-23 के लिए दलहन और तिलहन के बीज मिनीकिट वितरण" से सम्बंधित 
सरकारी प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) रिलीज़ का दस्तावेज पढ़ने या पीडीऍफ़ डाउनलोड के लिए, यहां क्लिक करें।
ये भी पढ़े: किस क्षेत्र में लगायें किस किस्म की मसूर, मिलेगा ज्यादा मुनाफा अगर आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले 3 सालों के दौरान देश में दलहन और तिलहन के उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि देखने को मिली है। अगर साल 2018-19 तक अब की तुलना करें तो दलहन के उत्पादन में 34.8% की वृद्धि दर्ज की गई है। जहां साल 2018-19 में दलहन का उत्पादन 727 किग्रा/हेक्टेयर था। जबकि मौजूदा वर्ष मे दलहन का उत्पादन बढ़कर 1292 किग्रा/हेक्टेयर पहुंच गया है।